कमजोर नवजात शिशु की पहचान और देखभाल?HealthPlanet

Posted on Sat 5th Jun 2021 : 16:04

नियमित ट्रैकिग कर नवजात की मौत को कम करेगा विभाग

दो किलोग्राम व इससे कम वजन वाले बच्चे, 37 सप्ताह से पहले जन्मे बच्चे और जन्म के पहले दिन ठीक से दूध नहीं पीने वाले नवजात की होगी बेहतर देखभाल

तीन श्रेणियों के शिशु का विशेष ख्याल रखना है जरूरी, कमजोर शिशुओं की बेहतर देखभाल से नवजात मृत्यु दर में कमी संभव, विभाग ने आंकड़े कम करने को ठाना संवाद सहयोगी, लखीसराय : बिहार में एक हजार जन्मे शिशुओं में 28 नवजात की मृत्यु जन्म के 28 दिनों के भीतर हो जाती है। मरने वाले नवजात शिशुओं की संख्या का एक तिहाई हिस्सा उन शिशुओं का होता है जो बहुत 37 सप्ताह से पहले पैदा होते हैं। इसकी जीवन सुरक्षा को लेकर स्वास्थ्य विभाग ने तीन श्रेणियों के शिशुओं के लिए नियमित ट्रैकिग व्यवस्था की है। ताकि नवजात शिशुओं की होने वाली मौत के आंकड़े को कम किया जा सके। यदि समय पर कम वजन वाले शिशुओं की पहचान कर उसकी सही देखभाल की जाती है तो उसके जीवित रहने की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। सभी प्रखंडों में आशा, एएनएम व आंगनबाड़ी सेविकाओं की मदद से ऐसे शिशुओं की लगातार ट्रैकिग की जाएगी। केयर इंडिया के टीम लीड नवेदउर रहमान ने यह जानकारी दी।

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ऐसे करें कमजोर नवजात शिशु की पहचान वैसे शिशु जिनका वजन दो किलोग्राम से नीचे हैं, वे कमजोर वजन वाले नवजात शिशु की श्रेणी में आते हैं। यदि नवजात जन्म से मां का दूध नहीं पी पा रहा है तो ये कमजोर शिशु होते हैं। साथ ही समय से पूर्व जन्म लेने वाले नवजात कमजोर होते हैं। इन्हें बोलचाल की भाषा में सतमसुवा या अठमसुआ भी कहा जाता है। ऐसे बच्चे सात या आठ माह में ही जन्म ले लेते हैं।

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आशा व एएनएम फोन पर लेती है नवजात की जानकारी ऐसे शिशु को चिह्नित करके स्वास्थ्य विभाग व केयर इंडिया के सुपरविजन में उसके जन्म से तीस दिन तक नियमित रूप से शिशु के स्वास्थ्य की जानकारी ली जाती है। आशा व एएनएम पहले सात दिनों तक रोजाना बच्चे के स्वास्थ की जानकारी फोन कर लेती हैं। पहला दिन, तीसरा दिन, सातवां दिन, 14वें दिन, 21वें दिन और 42वें दिन कमजोर नवजात शिशु के स्वास्थ्य की जानकारी फोन कर माता-पिता से ली जाती है। इसके लिए हर प्रखंड के स्वास्थ्य केंद्र पर जहां शिशु का जन्म हुआ, एक रजिस्टर होता है जिसमें उस बच्चे के स्वास्थ्य की जानकारी की रिपोर्ट लिखी होती है। इस तरह कमजोर वजन वाले नवजात शिशु की ट्रैकिग कर शिशुओं की मृत्यु दर को रोकने का काम किया जा रहा है।

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नवजात स्तनपान नहीं कर रहा तो लें आशा की मदद कमजोर नवजात स्तनपान नहीं कर पा रहा है तो ऐसे में आशा या स्वास्थ्यकर्मी से मिलकर यह बात जरूर बताएं। आधुनिक विधि से स्तनपान कराने के बारे में जानकारी लें। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण चार की रिपोर्ट के मुताबिक जिला में 39.2 प्रतिशत बच्चे ही एक घंटा के अंदर स्तनपान कर पाते हैं। प्रसूता के लिए जरूरी है कि बच्चे के जन्म के बाद एक घंटे के अंदर स्तनपान कराएं। मां का पहला पीला गाढ़ा दूध बच्चे में रोग प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करता है। नवजात शिशु को नियमित छह माह तक स्तनपान कराना जरूरी है। स्तनपान शिशु को डायरिया और निमोनिया जैसी गंभीर रोगों से बचाता है। मां का दूध ही शिशु का सर्वोत्तम आहार है। इसको देखते हुए अस्पतालों को बोतल दूध मुक्त बनाने का कवायद जारी है। स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए ब्रेस्ट फीडिग सेंटर भी बनाए गए हैं।

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